लाख बुराइयां हैं

लाख बुराइयां हैं हिन्दू धर्म में परंतु इसमें एक अच्छाई भी है। यह लचीला धर्म है, इसको मानने वाले किसी भी बाबा, सत्संगी या किसी भी पूजा पद्धति को अपना सकते हैं।

क्या यह आज़ादी किसी अन्य धर्मों में है?

सभी धर्मों के धर्म प्रचारक अपने धर्म को बढ़ाने के लिए अनेक तरीके अपनाते हैं, अपने धर्म के प्रति कट्टर रहते हैं। लेकिन पहली बात तो हिन्दू धर्म प्रचारक हैं ही नहीं फिर भी कोई हिन्दू धर्म को मानने वाला धर्म प्रचार करता है तो अपना अलग ही पंथ स्थापित कर लेता है, क्या यह आज़ादी किसी अन्य धर्म मे है?

लोगों को लगता है जाति-पाती, भेदभाव, उच्च नीच सिर्फ़ हिन्दू धर्म में है किसी अन्य धर्म में नहीं तो उनके लिए एक कहावत चरितार्थ होती है “दूर के ढोल सुहावने” किसी भी अन्य धर्म को नज़दीक से देख लो तस्वीर साफ़ हो जाएगी, हिन्दू धर्म से ज्यादा जड़ताएँ मिलेंगी।

किसी अन्य धर्म को मानने वाले अपने धर्म के बारे में भय के कारण ग़लत सोच नहीं सकते जबकि हिन्दू बीच चौराहे पर खड़ा होकर हिन्दू धर्म के पाखंडवाद को गाली दे सकता है, लोगो द्वारा उसे मूर्ख समझकर माफ़ कर दिया जाता है। है इतनी आज़ादी किसी अन्य धर्म में?

हां पिछले तीन-चार वर्षों में कुछ तथाकथित हिंदुओं ने राष्ट्रवादी सरकार की नज़रों में कट्टर हिन्दू दिखने के चक्कर में ऐसी ऐसी हरकतें की हैं जिससे हिन्दू धर्म की छवि धूमिल हुई है और राष्ट्रवादी सरकार की परेशानियां बढ़ी हैं। परंतु वह भूल जाते हैं कट्टरता हिंदुओं में है ही नही, इसी कारण यह धर्म बार बार बिखर कर भी जिंदा है।

फिर भी आज हिन्दू धर्म और भारत भूमि को ज़रूरत है किसी स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद, विनोबा भावे जैसे समाज सुधारक की जो धर्म और समाज को नई दिशा दे सके न कि ऐसे बाबाओं की जो जनता की भावनाओं के साथ खिलवाड़ कर धनकुबेर बन बैठे।

आज ज़रूरत है गांधी के चिंतन को समझने की, अम्बेडकर के समतामूलक सिद्धान्त को समझने की, भगतसिंह के सपनों के भारत को पहचानने की न कि पाखंडवाद में पड़कर धर्मभीरु बनने की।

राजीव गाँधी जी के नेतृत्व में कांग्रेस को पूर्ण बहुमत मिला तो भारत मे सूचना क्रांति को पंख लग गए थे। उनकी सरकार के बाद लंबे अंतराल पर कोई पूर्ण-बहुमत वाली मज़बूत सरकार भारतीय लोकतंत्र को 2014 में मिली थी, जो भारत के हित मे कठोर निर्णय लेकर स्वर्णिम भारत के निर्माण में अग्रसर होती। परंतु उसे फ़िज़ूल के चक्करों में फंसाकर सामाजिक एकता, धार्मिक अखंडता और जातिवाद का ज़हर घोलने वाला साबित करने पर उतारू हैं और नेतृत्व अपनी छवि सुधारने के चक्कर में सकारात्मक निर्णय नहीं ले पा रहा और सत्तालोलुपत सिद्ध होता जा रहा है।

2-4 सकारात्मक निर्णयों से खुश होकर जनता आज भी सरकार के वर्तमान नेतृत्व के साथ है वह 2019 में भी उन्हें मौक़ा देने को तैयार है बस नेतृत्व को चाहिए अपने बड़बोले समर्थकों का इलाज़ कर उन्हें संयम बरतने को कहे, जनता आपको 2014 जितना बम्पर बहुमत तो नहीं परंतु सत्ता जरूर सौंप देगी।

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