आरक्षण की आड़ में खिचती जातिगत तलवारें

आज़ादी के समय देश में चंद वर्षों के लिए सामाजिक रूप से दबे-कुचलों को आरक्षण देने की पहल शुरू की गई थी। तब यह आदर्श व्यवस्था मानी गयी थी कि इससे समता मूलक समाज का निर्माण होगा। परन्तु संविधान निर्मात्री सभा ने सोचा भी न होगा कि लोगों में बेईमानी-लोभ इतना गहरे बैठ जायेगा कि निचली पायदान पर बैठे ज़रूरत मंदों असली पिछड़े-दलित को मौका ही नहीं मिल पाएगा और आरक्षण वोट बैंक का साधन हो कर रह गया जाएगा।

आजादी के इतने वर्षों बाद भी आरक्षण का सही फायदा जरूरतमंद लोगों तक नहीं पहुंच पाने का बड़ा कारण रहा कि आरक्षण को ईमानदारी से लागु ही नहीं किया गया। अब तो राजनीतिक वातावरण के अराजक धुंधलके में जातिगत आरक्षण नई सनसनी सांय-सांय करने को आतुर है। कुछ राजनेता अपने तुच्छ स्वार्थों के लिये युगों युगों से स्थापित सामाजिक एवं सास्कृतिक ताने बाने को नष्ट करने के लिए जातिगत आरक्षण की आड़ में समाजविरोधी ताकतों को पोषित भी कर रहे हैं। जिसकी आड़ में समाज में सबल, हर प्रकार से सक्षम जातियों ने भी आरक्षण की मांग उठाई है – गुजरात में पटेल, पाटीदार और हरियाणा में जाट आरक्षण की मांग को इसी नजर से देखा सकता है। सक्षम जातियां दर्शाती हैं कि हमारी ताकत क्या है जिसके बल पर हमारी जाति क्या-क्या और कैसे-कैसे कर सकती है। क्यूंकि जातिगत वोट बैंक राजनैतिक दलों को शक्ति प्रदान करने का काम करते हैं। इसलिए जातिगत आरक्षण की राजनीति राजनितिक दलों को सदैव लुभाती भी है। अपने आकाओं के इशारे पर नये-नये छुटभैय्ये नेता अपनी पहचान बनाने के लिए छोटे-छोटे जातिगत आंदोलन आरम्भ करते है और ये आंदोलन अक्सर राजनीतिक महत्वाकांक्षा के चलते शातिर राजनितिक लोगों द्वारा हाईजैक कर लिए जाते हैं और कुछ हजार आरक्षित नौकरियों के लिए जाति की तलवारें खींच जाती हैं। जैसा कि हरियाणा से शांतिपूर्ण जाट आरक्षण आंदोलन को हाइजैक कर हिंसक जाट आंदोलन में तब्दील कर दिया गया और आपसी भाईचारे को 35 बनाम 1 या 1 बनाम 35 बना दिया गया। आरक्षण के लिए किए जा रहे हिंसक आंदोलनों से भाईचारे पर चोट लगती है इसका जीता-जगता उदाहरण है राजस्थान का गुर्जर आरक्षण आंदोलन और हरियाणा का जाट आरक्षण आन्दोलन। कैसे भारतवासी हैं ये, जो अपना अपना स्वार्थ साधने में लगे हैं और देश की एकता अखंडता को खतरे में डालने में लगे हुए हैं।

वैसे तो हर प्रांत में सैकड़ों सक्षम लोग सरकारी नौकरियों में आरक्षण पाने के चक्कर में भ्रस्ट अधिकारीयों से मिल कर अपनी फर्जी जातियां लिखवा देते हैं। ऐसा इस कारण भी हो रहा है कि कुछ जातियाँ एक प्रांत में आरक्षित हैं तो दूसरे प्रांत में अनारक्षित।’ आरक्षण की इस आपाधापी का एक बड़ा कारण ये भी है कि देश की यूनिवर्सिटियां मैकाले की शिक्षा नीति के तहत अपने शिक्षण की सेरोगेट कोख़ से काबिल डॉक्टर-इंजीनियर-वैज्ञानिकों को नहीं बल्कि सिर्फ डिग्री धारक बेरोजगारों की फ़ौज खड़ी कर रही हैं जो सरकारी नौकरियाँ पाने के लिए आरक्षण को एक परमाणु की भाँति इस्तेमाल कर जातिगत भेदभाव को पोषित कर रही हैं।

जिन जातियों को आरक्षण प्राप्त नहीं है, उनमें भी गरीब परिवार हैं। वहीं, जिन जातियों को आरक्षण प्राप्त है, उनमें बहुत से परिवार इतने संपन्न है कि उन्हें आरक्षण की जरूरत ही नहीं है। यही असमानता है कि देश में भाईचारा लगातार बिगड़ता जा रहा है। क्या ये संभव नहीं हो सकता कि देश में जाति के आधार पर आरक्षण देने की नीति को समाप्त किया जाए तथा आर्थिक आधार (जिसके परिवार में किसी भी प्रकार का जमीन का टुकड़ा न हो, परिवार में कोई सरकारी नौकरी न हो) पर हर जाति, धर्म के गरीब परिवारों को आरक्षण का लाभ दिया जाए? आज ज़रूरत है जो सक्षम हो गए या सक्षम है वे आगे आकर गैस सब्सिडी की तरह आरक्षण की जिद्द को इसके असली हकदारों के लिए छोड़ें.. ताकि आरक्षण का असली मकसद सिद्ध हो सके.. वर्ना आबादी तो बढ़ेगी ही और आरक्षण की आड़ में जातिगत तलवारें खिचती रहेंगी। यदि किसी दल की सरकार जाति के आधार पर आरक्षण नीति को समाप्त कर दे, तब इस तरह के आंदोलनों से होने वाले नुकसान से बचा जा सकेगा।

सबसे बड़ा तो जातियों का यह झमेला खत्म हो तो देश विकास की पटरी पर दौड़ पड़ेगा क्योंकि फिर वोट बैंक की उस तरह से चिंता नहीं होगी, जैसी आज होती है। परन्तु संस्कृति, जनसंख्या विस्फोट और विकास की हमारी जरूरतों से संबंधित हमारी समस्याओं का समाधान हो सके ऐसी जीवटता किसी राजनितिक दल में नज़र नहीं आती। ऐसा लगता है जबतक समोसे में आलू रहेगा तब तक इन राजनैतिक दलों का आरक्षण-आरक्षण वाला खेल चालू रहेगा।

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